नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से अपील की है कि जब तक जरूरी न हो, सोना खरीदने से बचें। इसके साथ ही उन्होंने गैर-जरूरी विदेश यात्राओं को कम करने और विदेश में शादी करने के बजाय भारत में ही वेडिंग डेस्टिनेशन तलाशने की बात कही है। पिछले चार महीनों में यह दूसरी बार है जब प्रधानमंत्री ने इस तरह की अपील की है।
पीएम मोदी ने यह संदेश किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक से वीडियो संदेश के जरिए दिया। दिलचस्प बात यह है कि उनकी अपील ऐसे समय आई है जब भारत की अर्थव्यवस्था ने मजबूत प्रदर्शन किया है। अप्रैल-जून तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 7.8% रही, जो उम्मीदों से बेहतर है।
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो फिर प्रधानमंत्री सोना खरीदने, विदेश घूमने और विदेश में शादी करने जैसे खर्चों को कम करने की बात क्यों कर रहे हैं?
इसके पीछे असल मुद्दा है विदेशी मुद्रा की बचत, बढ़ता आयात बिल और व्यापार घाटा। मार्केट एवं कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के मुताबिक, इन खर्चों का असर सिर्फ किसी एक परिवार के बजट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की स्थिति पर भी पड़ सकता है।
1. सोना खरीदने से क्यों बढ़ता है दबाव?
भारत में सोने की मांग काफी बड़ी है, लेकिन घरेलू उत्पादन इस मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में देश को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा सोने के आयात के जरिए पूरा करना पड़ता है।
यही वजह है कि जब भारत में सोने की मांग बढ़ती है तो उसके साथ इंपोर्ट बिल भी बढ़ता है। सोना खरीदने के लिए विदेशों को भुगतान करना पड़ता है और इसके लिए विदेशी मुद्रा, खासकर डॉलर, की जरूरत होती है।
अनुज गुप्ता के मुताबिक, कच्चे तेल के बाद सोना भारत के प्रमुख आयातों में शामिल है। इसलिए सोने के आयात में तेज बढ़ोतरी व्यापार घाटे को बढ़ा सकती है। अगर उस समय डॉलर की मांग पहले से ही ज्यादा हो, तो रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है।
इस साल भी सोने के आयात में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। रिपोर्टों के अनुसार, वित्त वर्ष की शुरुआत के बाद शुरुआती चार महीनों में भारत का गोल्ड इंपोर्ट पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 32% से ज्यादा बढ़ा है। वहीं, जुलाई में देश का व्यापार घाटा करीब 32 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो जनवरी के बाद सबसे ऊंचे स्तरों में रहा।
भारत में सोने की मांग इतनी बड़ी क्यों है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड कंज्यूमर देशों में शामिल है। यहां सोने की खरीद केवल निवेश के नजरिए से नहीं होती, बल्कि शादियों, त्योहारों और पारंपरिक बचत के लिए भी बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जाता है।
यानी सोने की कीमत बढ़ने या घटने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि देश में इसकी कुल मांग कितनी है। अगर करोड़ों परिवार गैर-जरूरी सोने की खरीद को कुछ समय के लिए टालते हैं, तो इसका असर देश के कुल आयात बिल पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि प्रधानमंत्री की अपील को व्यक्तिगत खर्च के बजाय व्यापक आर्थिक संदर्भ में देखा जा रहा है।
2. विदेश यात्रा और डेस्टिनेशन वेडिंग का पैसा बाहर क्यों जाता है?
प्रधानमंत्री मोदी की अपील सिर्फ सोने तक सीमित नहीं है। उन्होंने भारतीयों से गैर-जरूरी विदेश यात्राओं को कम करने और शादी के लिए विदेशी डेस्टिनेशन चुनने के बजाय भारत में ही आयोजन करने की अपील की है।
इसे समझने के लिए विदेश यात्रा का एक सामान्य उदाहरण लेते हैं।
जब कोई भारतीय विदेश जाता है तो वह वहां होटल, रेस्टोरेंट, स्थानीय परिवहन, शॉपिंग, मनोरंजन और अन्य सेवाओं पर पैसा खर्च करता है। यानी उसके खर्च का बड़ा हिस्सा उस देश की अर्थव्यवस्था में चला जाता है।
डेस्टिनेशन वेडिंग में यह रकम और बड़ी हो सकती है। एक शादी में मेहमानों की फ्लाइट, होटल में ठहरना, वेन्यू, खाना, सजावट और स्थानीय ट्रांसपोर्ट समेत कई तरह के खर्च शामिल होते हैं।
प्रधानमंत्री का तर्क है कि अगर यही खर्च भारत में किया जाए तो पैसा भारतीय होटल, ट्रैवल कंपनियों, कैटरर्स, इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों, टूरिज्म इंडस्ट्री और स्थानीय कारोबारियों तक पहुंचेगा।
पीएम मोदी ने इसी संदर्भ में ‘Wed in India’ का मंत्र अपनाने की अपील की है। उनका संदेश है कि विदेश में छुट्टी मनाने या शादी करने के बजाय भारत के अलग-अलग खूबसूरत पर्यटन स्थलों को भी विकल्प बनाया जा सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि विदेश जाना बंद कर दें
प्रधानमंत्री की अपील को इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि भारतीयों को हर तरह की विदेश यात्रा या सोने की खरीदारी बंद कर देनी चाहिए।
फोकस मुख्य रूप से गैर-जरूरी खर्चों को घरेलू अर्थव्यवस्था की तरफ मोड़ने पर है।
अगर किसी परिवार का वही बजट भारत में किसी पर्यटन स्थल पर खर्च होता है, तो उस रकम से घरेलू टूरिज्म, होटल, ट्रांसपोर्ट और स्थानीय रोजगार को फायदा मिल सकता है।
3. GDP 7.8% बढ़ रही है, फिर भी विदेशी मुद्रा बचाना क्यों जरूरी?
यह सबसे बड़ा सवाल है। जब भारत की अर्थव्यवस्था अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की दर से बढ़ी है, तो विदेशी मुद्रा को लेकर इतनी चिंता क्यों?
इसका जवाब भारत की आयात निर्भरता में छिपा है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। देश की आर्थिक गतिविधियां बढ़ने के साथ ऊर्जा की मांग भी बनी रहती है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो भारत का तेल आयात बिल भी बढ़ जाता है।
ऐसे समय में भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य सामानों के आयात के लिए भी विदेशी मुद्रा की जरूरत होती है।
यानी समस्या सिर्फ एक चीज के आयात की नहीं है। चुनौती तब बढ़ती है जब तेल का बिल, गोल्ड इंपोर्ट और दूसरे आयात एक साथ बढ़ने लगते हैं।
रुपये पर भी पड़ सकता है असर
जब देश को आयात के भुगतान के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत होती है तो डॉलर की मांग बढ़ सकती है। अगर डॉलर की मांग बढ़े और दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा की आमदनी उसी अनुपात में न बढ़े, तो रुपये पर दबाव आ सकता है।
इसीलिए सरकार का जोर ऐसे खर्चों को कम करने पर रहता है जिनसे विदेशी मुद्रा देश से बाहर जाती है और जिनका कोई तत्काल आर्थिक लाभ जरूरी नहीं है।
3 पॉइंट्स में समझिए PM Modi की अपील का गणित
1. कम गैर-जरूरी सोना खरीदें:
सोने का बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है। मांग बढ़ने से इंपोर्ट बिल और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ सकता है।
2. छुट्टियां और शादियां भारत में करें:
विदेश में खर्च होने वाली रकम भारत में खर्च होने पर घरेलू पर्यटन, होटल, ट्रांसपोर्ट और दूसरे कारोबारों को फायदा मिल सकता है।
3. विदेशी मुद्रा बचाना जरूरी:
कच्चे तेल समेत कई जरूरी सामानों के लिए भारत को भारी आयात भुगतान करना पड़ता है। ऐसे में गैर-जरूरी विदेशी खर्च कम करने से विदेशी मुद्रा की बचत में मदद मिल सकती है।
मजबूत अर्थव्यवस्था के बीच भी क्यों महत्वपूर्ण है यह संदेश?
भारत की तेज आर्थिक वृद्धि निश्चित तौर पर सकारात्मक संकेत है। लेकिन GDP की मजबूत ग्रोथ का मतलब यह नहीं है कि बाहरी आर्थिक जोखिम खत्म हो गए हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी ऊर्जा और कई दूसरे महत्वपूर्ण सामानों के आयात पर निर्भर है। वैश्विक बाजार में तेल की कीमत, डॉलर की चाल, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे फैक्टर देश के आयात बिल को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए प्रधानमंत्री की अपील का व्यापक उद्देश्य यह है कि जहां संभव हो, भारतीयों का खर्च भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर ही रहे।
आखिरकार, एक परिवार अगर भारत में छुट्टी मनाता है या देश में डेस्टिनेशन वेडिंग करता है, तो उसका खर्च किसी न किसी भारतीय होटल, टैक्सी ऑपरेटर, दुकानदार, कैटरर, इवेंट कंपनी या स्थानीय कर्मचारी की आय बन सकता है।
यही ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘Wed in India’ के पीछे का आर्थिक तर्क है—घरेलू मांग को मजबूत करना, विदेशी मुद्रा की अनावश्यक निकासी को सीमित करना और देश के कारोबारियों को ज्यादा आर्थिक गतिविधि का फायदा पहुंचाना।


