Bangladesh Power Crisis: बांग्लादेश इस समय गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है। राजधानी ढाका समेत कई बड़े शहरों में बिजली कटौती की समस्या बनी हुई है। देश में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर के साथ-साथ विदेशी मुद्रा का दबाव भी चुनौती बना हुआ है। ऐसे समय में बांग्लादेश भारत से मिलने वाली बिजली के लिए मामूली अतिरिक्त शुल्क पर सवाल उठा रहा है, जबकि चीन से बिजली खरीदने के लिए उसे भारत की तुलना में काफी अधिक कीमत चुकानी होगी।
खास बात यह है कि चीन से प्रस्तावित बिजली परियोजना की क्षमता महज 42 मेगावाट है। यानी यह परियोजना भारत से मिलने वाली बिजली का विकल्प नहीं बन सकती। हालांकि, इस प्रोजेक्ट की एक खासियत है—इसमें कचरे से बिजली पैदा की जाएगी। इससे बांग्लादेश को बिजली संकट के साथ-साथ ढाका में बढ़ती कचरे की समस्या से निपटने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
भारत से बिजली के लिए सिर्फ 1 पैसे के शुल्क पर आपत्ति
भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से बिजली का कारोबार होता रहा है। भारत से मिलने वाली बिजली बांग्लादेश के पावर सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण है। हाल ही में भारत के केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) ने क्रॉस-बॉर्डर बिजली लेनदेन से जुड़े ग्रिड ऑपरेशन, शेड्यूलिंग, मीटरिंग और अन्य प्रबंधन खर्चों को कवर करने के लिए प्रति यूनिट ₹0.01 यानी 1 पैसे का सर्विस चार्ज प्रस्तावित किया था।
बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (BPDB) ने इस अतिरिक्त शुल्क पर आपत्ति जताई। इसके बाद भारत की ओर से इस शुल्क को घटाकर आधा पैसा प्रति यूनिट करने की बात सामने आई।
यानी जिस शुल्क की बात हो रही थी, वह बिजली की पूरी कीमत के मुकाबले बेहद मामूली था। इसके बावजूद इस पर बांग्लादेश की ओर से आपत्ति जताई गई।
चीन से 25 टका प्रति यूनिट बिजली खरीदने की तैयारी
दूसरी तरफ चीन से जुड़ी एक परियोजना के तहत बांग्लादेश को बिजली के लिए करीब 25 टका प्रति यूनिट का भुगतान करना होगा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बांग्लादेश भारत से करीब 11 टका प्रति यूनिट की दर पर बिजली खरीद रहा था।
अगर इन दोनों दरों की तुलना करें तो चीन से मिलने वाली बिजली की कीमत भारत की तुलना में करीब 127 फीसदी ज्यादा बैठती है।
एक टका की कीमत करीब ₹0.77 के आसपास मानें तो 25 टका प्रति यूनिट की कीमत भारतीय मुद्रा में लगभग ₹19 के बराबर बैठती है। इसके मुकाबले भारत से करीब 11 टका प्रति यूनिट की दर काफी कम है।
हालांकि, दोनों परियोजनाओं की सीधी तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि चीन की परियोजना सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है।
कचरे से बिजली बनाएगा चीन
चीन की इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसका वेस्ट-टू-एनर्जी मॉडल है। यानी शहर से निकलने वाले कचरे का इस्तेमाल करके बिजली का उत्पादन किया जाएगा।
ढाका जैसे तेजी से बढ़ते शहर के लिए कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। आबादी बढ़ने के साथ ठोस कचरे की मात्रा भी बढ़ रही है। ऐसे में कचरे को ऊर्जा में बदलने वाली परियोजना से दो समस्याओं पर एक साथ काम करने का दावा किया जा रहा है।
इस परियोजना की बिजली उत्पादन क्षमता करीब 42 मेगावाट बताई गई है। इसलिए इसे भारत से मिलने वाली बिजली का सीधा विकल्प कहना सही नहीं होगा। इसका उद्देश्य बिजली पैदा करने के साथ-साथ कचरे के निस्तारण में मदद करना भी है।
बिजली संकट के बीच बढ़ी चुनौतियां
बांग्लादेश के सामने फिलहाल कई मोर्चों पर दबाव है। बिजली की मांग को पूरा करना, ईंधन की उपलब्धता बनाए रखना और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव को नियंत्रित करना बड़ी चुनौतियां हैं।
ऐसे में भारत से मिलने वाली अपेक्षाकृत सस्ती बिजली और चीन की महंगी लेकिन वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजना की तुलना सिर्फ प्रति यूनिट कीमत के आधार पर करना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
भारत से मिलने वाली बिजली मुख्य रूप से बिजली आपूर्ति को मजबूत करने में मदद करती है, जबकि चीन की प्रस्तावित परियोजना बिजली उत्पादन के साथ कचरा प्रबंधन का समाधान भी देने की कोशिश करती है।
भारत और चीन के बीच क्यों अहम है यह तुलना?
बांग्लादेश के ऊर्जा क्षेत्र में भारत और चीन दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। भारत भौगोलिक रूप से नजदीक होने के कारण बिजली व्यापार में महत्वपूर्ण साझेदार है। दूसरी ओर, चीन बुनियादी ढांचे और ऊर्जा परियोजनाओं में बड़े निवेश के लिए जाना जाता है।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि बांग्लादेश के लिए महंगी बिजली परियोजना का आर्थिक लाभ कितना होगा और कचरा प्रबंधन से मिलने वाला अतिरिक्त फायदा उसकी ऊंची बिजली लागत को कितना संतुलित कर पाएगा।
इसलिए 25 टका बनाम 11 टका की तुलना एक बड़ा अंतर जरूर दिखाती है, लेकिन परियोजना की प्रकृति अलग होने के कारण इसे केवल बिजली की कीमत के आधार पर देखना पूरी तरह उचित नहीं होगा।
निष्कर्ष
बांग्लादेश में बिजली संकट के बीच भारत और चीन से मिलने वाली बिजली की कीमतों को लेकर बहस तेज हो सकती है। भारत से मामूली अतिरिक्त सर्विस चार्ज पर आपत्ति और चीन की वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजना के लिए अधिक कीमत भुगतान करने का मामला पहली नजर में विरोधाभासी दिखाई देता है।
लेकिन चीन की परियोजना का मकसद केवल बिजली उत्पादन नहीं, बल्कि ढाका के कचरा निस्तारण की समस्या को कम करना भी है। यही वजह है कि इसकी लागत भारत से मिलने वाली पारंपरिक बिजली से काफी अधिक हो सकती है।


