India Power Crisis: भारत में बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ता नजर आ रहा है। कमजोर मॉनसून और अल नीनो के असर ने हाइड्रोपावर उत्पादन को प्रभावित किया है। 29 अगस्त तक देश के हाइड्रो प्रोजेक्ट्स से बिजली उत्पादन पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 12% कम रहा। दूसरी ओर, बिजली की मांग मजबूत बनी हुई है। ऐसे में आने वाले दिनों में पावर सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
नई दिल्ली: कमजोर बारिश और जलाशयों में घटते पानी के स्तर ने भारत के पावर सिस्टम के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। नदियों और रिजर्वॉयर में पानी कम होने से हाइड्रोपावर प्लांट्स से बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके कारण लगातार चौथे महीने हाइड्रोपावर उत्पादन में गिरावट की आशंका जताई जा रही है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, 29 अगस्त तक भारत में हाइड्रोपावर उत्पादन सालाना आधार पर लगभग 12% नीचे रहा। वहीं, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले महीने देश में बारिश सामान्य से 16% से अधिक कम रही। कमजोर मॉनसून और अल नीनो की स्थिति ने हाइड्रोपावर सेक्टर की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
बिजली की मांग बनी हुई है ऊंची
हाइड्रोपावर उत्पादन में गिरावट ऐसे समय में आई है जब देश में बिजली की मांग लगातार बनी हुई है। कमजोर मॉनसून के कारण कई इलाकों में तापमान अपेक्षाकृत ज्यादा रहा है। वहीं, बारिश कम होने से किसानों को सिंचाई के लिए बिजली पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है।
इसका सीधा असर बिजली की मांग पर पड़ रहा है। खासकर शाम के समय स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है। दिन में सोलर पावर से मिलने वाली बिजली शाम होते-होते कम हो जाती है, जबकि बिजली की खपत बनी रहती है। ऐसे समय में हाइड्रोपावर जैसी तेजी से उपलब्ध कराई जा सकने वाली बिजली की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार को बढ़ानी पड़ी कोयला आधारित बिजली पर निर्भरता
हाइड्रोपावर उत्पादन में कमी की भरपाई के लिए सरकार को इस साल की शुरुआत में बारिश के मौसम के दौरान भी एक बड़े कोयला आधारित पावर प्लांट को चालू रखने के लिए आपातकालीन व्यवस्था बढ़ानी पड़ी थी।
यह स्थिति बताती है कि देश की बिजली व्यवस्था में हाइड्रोपावर की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। जब सोलर और हाइड्रो से उत्पादन में उतार-चढ़ाव होता है, तब कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव आ जाता है।
जून में हाइड्रोपावर उत्पादन 21% तक गिरा
इस साल जून में हाइड्रोपावर उत्पादन में करीब 21% की गिरावट दर्ज की गई थी। यह गिरावट लगभग 12 वर्षों में सबसे सूखे जून के बीच देखने को मिली। फरवरी 2024 के बाद यह हाइड्रोपावर उत्पादन में सबसे बड़ी गिरावट थी।
जुलाई में बारिश की स्थिति में कुछ सुधार हुआ, जिससे हाइड्रोपावर उत्पादन को थोड़ी राहत मिली। लेकिन अगस्त में एक बार फिर बारिश कमजोर पड़ गई। इससे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ गया।
मॉनसून का अंतिम महीना सितंबर होता है और अगर इस दौरान भी सामान्य से कम बारिश रहती है, तो जलाशयों और नदियों में पानी की स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। अभी तक मॉनसून सीजन में बारिश में करीब 14% की कमी बताई जा रही है, जिसका असर मिट्टी की नमी और रिजर्वॉयर के जलस्तर पर भी पड़ा है।
देश की कुल बिजली क्षमता में हाइड्रोपावर की हिस्सेदारी करीब 11%
भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में हाइड्रोपावर की हिस्सेदारी लगभग 11% है। देश में हाइड्रोपावर की कुल क्षमता करीब 52 गीगावाट बताई जाती है।
सरकार के लिए हाइड्रोपावर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नॉन-फॉसिल यानी जीवाश्म ईंधन से मुक्त बिजली क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का विस्तार कई चुनौतियों से जुड़ा है।
बड़े बांधों के निर्माण से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दे, परियोजनाओं की लंबी निर्माण अवधि और पानी की उपलब्धता पर निर्भरता हाइड्रोपावर की ग्रोथ को प्रभावित करती रही है।
पिछले साल की भारी बारिश भी बनी वजह
इस साल हाइड्रोपावर उत्पादन में गिरावट को समझने के लिए पिछले साल का आधार भी महत्वपूर्ण है। 2025 में भारी बारिश के कारण बांधों और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स से बिजली उत्पादन काफी ज्यादा रहा था।
इस वजह से इस साल की तुलना एक ऊंचे बेस से हो रही है। यानी मौजूदा गिरावट का एक हिस्सा कमजोर मॉनसून से जुड़ा है, जबकि एक कारण पिछले साल का असामान्य रूप से मजबूत हाइड्रोपावर उत्पादन भी है।
‘रन-ऑफ-द-रिवर’ प्रोजेक्ट्स पर भी असर
भारत की करीब 52 गीगावाट हाइड्रोपावर क्षमता का एक बड़ा हिस्सा ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ प्रोजेक्ट्स से जुड़ा है। ऐसे प्रोजेक्ट्स बड़े जलाशयों में पानी जमा करने के बजाय नदियों के प्राकृतिक बहाव पर ज्यादा निर्भर करते हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में स्थित कुछ हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को गर्मियों में बर्फ पिघलने से अतिरिक्त पानी मिलता है। इसके विपरीत, देश के कई अन्य नदी बेसिन मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर हैं। ऐसे में कमजोर मॉनसून का सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।
आगे क्यों बढ़ सकती है बिजली संकट की चिंता?
भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अगर हाइड्रोपावर उत्पादन में गिरावट लंबे समय तक जारी रहती है, तो ग्रिड को मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अन्य स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है।
खासकर शाम के पीक आवर्स में यह चुनौती ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उस समय सोलर पावर का योगदान घटने लगता है। यदि उसी दौरान हाइड्रोपावर से भी अपेक्षित उत्पादन नहीं मिलता, तो कोयला आधारित बिजली और अन्य स्रोतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
फिलहाल स्थिति को सीधे तौर पर देशव्यापी बिजली संकट कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन कमजोर मॉनसून, घटता जलस्तर और मजबूत बिजली मांग का संयोजन पावर सिस्टम के लिए निश्चित रूप से एक चुनौती है। आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति और जलाशयों में पानी का स्तर यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि बिजली उत्पादन पर दबाव कितना बढ़ता है।


