भारतीय सैन्य रणनीति और आधुनिक युद्ध तकनीक को लेकर हाल ही में एक अहम बहस फिर से चर्चा में आ गई है। यह बहस इस सवाल पर केंद्रित है कि क्या भविष्य के युद्धों में पायलट वाले लड़ाकू विमानों की जरूरत उतनी ही होगी जितनी पहले हुआ करती थी, या फिर सटीक लंबी दूरी की मिसाइलें ही अधिकांश मिशनों को अंजाम देने के लिए पर्याप्त होंगी।
यह चर्चा तब और तेज हो गई जब आर्टिलरी के पूर्व डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल पी. आर. शंकर (सेवानिवृत्त) ने एक कार्यक्रम के दौरान अपने विचार रखे। उनका कहना है कि आधुनिक युद्ध में कई ऐसे लक्ष्य हैं जिन्हें बिना फाइटर जेट को जोखिम में डाले भी पूरी सटीकता के साथ नष्ट किया जा सकता है।
स्थिर सैन्य ठिकाने: आसान लेकिन रणनीतिक लक्ष्य
लेफ्टिनेंट जनरल शंकर का तर्क काफी सरल लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार दुश्मन के एयरबेस, बंकर, रनवे और अन्य स्थिर सैन्य ढांचे ऐसे लक्ष्य होते हैं जो अपनी जगह नहीं बदल सकते।
यही कारण है कि ये लक्ष्य लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइलों के लिए बेहद उपयुक्त होते हैं। ऐसे हमलों में लक्ष्य पहले से तय होता है, और आधुनिक तकनीक के जरिए उसे सटीकता के साथ भेदा जा सकता है।
उनका मानना है कि जब लक्ष्य स्थिर है, तो उसे हासिल करने के लिए मानवयुक्त विमान को जोखिम में डालना हमेशा जरूरी नहीं होता।
आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप
पिछले कुछ वर्षों में युद्ध की प्रकृति तेजी से बदली है। पहले जहां वायु युद्ध का मतलब था कि फाइटर जेट दुश्मन के एयरस्पेस में प्रवेश करें और मिशन पूरा करें, वहीं अब स्टैंडऑफ हथियारों (Stand-off Weapons) ने तस्वीर बदल दी है।
ये हथियार इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि इन्हें अपनी ही सुरक्षित सीमा से लॉन्च किया जा सकता है और ये सैकड़ों किलोमीटर दूर तक सटीक हमला कर सकते हैं।
लेफ्टिनेंट जनरल शंकर के अनुसार, यही बदलाव आने वाले समय में वायुसेना की रणनीति को पूरी तरह बदल सकता है।
Operation Sindoor 2.0 का संदर्भ
यह बहस ऐसे समय में सामने आई है जब हाल ही में हुए सैन्य ऑपरेशन के संदर्भ भी चर्चा में हैं।
मई 2025 में हुए एक बड़े सैन्य अभियान के दौरान भारत ने सीमा पार कई आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इस अभियान में वायुसेना और थलसेना दोनों की भूमिका रही थी और कई लक्ष्यों को सफलतापूर्वक नष्ट किया गया था।
हालांकि, इस ऑपरेशन के दौरान कुछ ऐसे पहलू भी सामने आए जिन्होंने रणनीतिक सोच पर नए सवाल खड़े कर दिए। विशेष रूप से यह चर्चा हुई कि क्या सभी लक्ष्यों के लिए फाइटर जेट का उपयोग सबसे प्रभावी विकल्प था या नहीं।
फाइटर जेट्स की सीमाएं और जोखिम
पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल का एक प्रमुख तर्क यह भी है कि जब फाइटर जेट दुश्मन के एयर डिफेंस नेटवर्क के करीब जाते हैं, तो उनका जोखिम काफी बढ़ जाता है।
दुश्मन के पास मौजूद एयर-टू-एयर मिसाइल सिस्टम और रडार नेटवर्क किसी भी घुसपैठ को बेहद खतरनाक बना सकते हैं।
उनके अनुसार, कुछ मामलों में पहले दिन ही मिशन को पूरा करने के लिए विमान भेजे गए थे, लेकिन इसके दौरान खतरा भी बना रहा। यह स्थिति रणनीतिक दृष्टिकोण से सवाल खड़े करती है कि क्या यही सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका था।
ब्रह्मोस और स्टैंडऑफ सिस्टम की भूमिका
लेफ्टिनेंट जनरल शंकर का मानना है कि भविष्य की रणनीति में स्वदेशी स्टैंडऑफ सिस्टम जैसे लंबी दूरी की सुपरसोनिक मिसाइलें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
ऐसे हथियारों की खासियत यह होती है कि:
- ये बहुत तेज गति से लक्ष्य तक पहुंचते हैं
- सटीक टारगेटिंग क्षमता रखते हैं
- लॉन्च करने वाला प्लेटफॉर्म सुरक्षित दूरी पर रहता है
- मानव जीवन का जोखिम लगभग खत्म हो जाता है
उनका सुझाव है कि अगर लक्ष्य पहले से तय और स्थिर हैं, तो ऐसे हथियारों का उपयोग अधिक प्रभावी और सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
क्या फाइटर जेट्स अब अप्रासंगिक हो रहे हैं?
यह सवाल इस बहस का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। लेफ्टिनेंट जनरल शंकर यह नहीं कहते कि फाइटर जेट्स की जरूरत खत्म हो जाएगी, बल्कि उनका तर्क यह है कि इनका उपयोग रणनीतिक रूप से अधिक सोच-समझकर होना चाहिए।
फाइटर जेट्स की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है, खासकर:
- एयर सुपीरियॉरिटी के लिए
- गतिशील लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए
- रियल टाइम डॉगफाइट परिस्थितियों में
लेकिन स्थिर और पहले से तय लक्ष्यों के लिए, मिसाइल आधारित हमले अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।
आधुनिक युद्ध में संतुलित रणनीति की जरूरत
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य का युद्ध केवल एक तकनीक पर निर्भर नहीं रहेगा। इसमें फाइटर जेट्स, मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और साइबर युद्ध सभी का मिश्रण होगा।
इसलिए असली चुनौती यह तय करना है कि किस स्थिति में कौन-सी तकनीक सबसे प्रभावी होगी।
लेफ्टिनेंट जनरल शंकर का विचार इसी संतुलन की ओर इशारा करता है—जहां जोखिम कम हो और परिणाम अधिक प्रभावी हों।
रणनीति पर नई सोच की शुरुआत
यह बहस सिर्फ तकनीक की नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच के बदलाव की भी है। भारतीय सैन्य ढांचा पिछले कुछ वर्षों में लगातार आधुनिक हो रहा है, और स्वदेशी हथियार प्रणालियों का उपयोग तेजी से बढ़ा है।
ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि भविष्य में युद्ध रणनीति कैसे विकसित होगी—क्या वह पूरी तरह तकनीक आधारित होगी या मानव निर्णय अभी भी केंद्र में रहेगा।
निष्कर्ष
लेफ्टिनेंट जनरल पी. आर. शंकर की यह राय एक महत्वपूर्ण रणनीतिक चर्चा को जन्म देती है। यह स्पष्ट करती है कि आधुनिक युद्ध में केवल ताकत ही नहीं, बल्कि समझदारी और तकनीक का सही उपयोग भी उतना ही जरूरी है।
फाइटर जेट्स और मिसाइल सिस्टम दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है, लेकिन असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें कब और कैसे इस्तेमाल किया जाता है।
आने वाले समय में यह बहस और भी गहरी हो सकती है, क्योंकि युद्ध का स्वरूप लगातार बदल रहा है और हर देश अपनी रणनीति को नए युग के अनुसार ढाल रहा है।
Also Read:


